बलात्कारी शिव कुमार यादव यदि नेता होता तो?

दिलवालो की दिल्ली फिर शर्मसार हुई। देश की राजधानी में उबेर टैक्सी के ड्राईवर ने एक 25 वर्षिय महिला के साथ बलात्कार किया। लेकिन अब केंद्र में मोदी सरकार है। ड्राईवर तुरंत पकड़ा गया और उसे जेल भेज दिया गया। इतना ही नहीं इस ड्राईवर को नौकरी पर रखने वाली उबेर टैक्सी पर बंदी लगा दी गई। भले ही उबेर कंपनी ने ड्राईवर यादव का पुलिस विरेफिकेशन करवा लिया था। लेकिन जिम्मेदारी तो उनकी भी बनती है। महिलाओ के खिलाफ बढ़ते अपराधो को रोकने के लिए सख्ती जरुरी है।

3 साल पहले ऐसा ही एक बलात्कार बलात्कार राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। बलात्कार के बाद हुआ सामूहिक बलात्कार। इस बार बलात्कारी कोई टैक्सी ड्राईवर नहीं था। एक नेता और उसके 16 सहयोगी। पुलिस की जाँच 1 साल चली और जाँच में आरोप झुटे पाये गए। पीड़िता ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ट्रायल कोर्ट और फिर जिला कोर्ट ने उसकी याचिका को ठुकरा दिया। आखिर उच्च न्यायलय ने आदेश दिया सभी 16 दोषियों को न्यायलय में पेश करने का।

लेकिन अब तक नेताजी केंद्र सरकार में मंत्री बन चुके थे। मंत्रीजी दिल्ली में है और राजस्थान पुलिस के अनुसार, पुलिस उन्हें नोटिस थमाने में असमर्थ है।

दोनों ही घटनाओ में आरोप सिद्ध होना बाकि है। दोनों ही मामलो में सम्भावना है की महिला वस्तव में पीड़ित हो या आरोप झुटे हो। लेकिन क्या न्यायव्यवस्था दोनों मामलो में सामान है?

एक ग्रामीण गरीब अशिक्षित महिला जो सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई और पिछले 3 सालो से न्याय के लिए ठोकरे खा रही है। दूसरी राजधानी दिल्ली की एक मध्यम वर्गीय शिक्षित महिला जिसे न्याय के लिए इन्तेजार करना होगा लकिन आरोपी पुलिस गिरफ्त में है। उसे समाज और मीडिया का पूरा सहयोग भी मिला।

एक अनपढ़ गरीब ड्राईवर है जिसने पुलिस के डंडे खाते ही अपना गुनाह कबूल कर लिया। हो सकता है मामला कोर्ट में पहुंचे तब तक वो भी खुद को निर्दोश बताने लग जाये। दूसरा एक नेता जो अपने आप को निर्दोष बताता है, उसे न पुलिस गिरफ्तार करती है न वो कोर्ट में पेश होता है।

दोनों मामलो में कौन दोषी है यह हम नहीं जानते। लेकिन क्या क़ानूनी प्रक्रिया दोनों मामलो में एक सी है? क्या हमारी न्याय व्यवस्था सभी के लिए समान है – ग्रामीण हो या शहरी? शिक्षित हो या अशिक्षित? गरीब हो या अमीर? आम आदमी हो या नेता?

 

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