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Politics 

दिल्ली का जनादेश – व्हिप सिस्टम समाप्त करने का मौका

AK4सत्यमेव जयते का अर्थ है “सत्य की ही विजय होगी”. लेकिन हम अक्सर ये मानते है की जो विजयी हुआ वही सत्य है. एक ही वर्ष में दो बार अनुभव हो गया, जब जब दिल्ली में केजरीवाल की जीत हुई, लोग हमें सम्मानपूर्वक देखते है, बधाई देते है, हमारी नीतियो की तारीफ करते है और विरोधियो की आलोचना भी. वही लोग हमारी पिछली विजय से पहले और केजरीवाल के इस्फीफे के बाद से लेकर कुछ दिन पहले तक हमें एक चुटकुला समझते थे, हर बार इस्तीफे और धरने को लेकर सवाल करते थे. पिछले कुछ दिनो में न किसी ने इस्तीफे की बात की न धरने की. ऐसा ही मोदी जी के साथ भी हुआ था. लोकसभा चुनावो में उनकी जीत से पहले टीवी पर उनके हर इंटरव्यू की शुरुवात एक ही सवाल से होती, 2002 के दंगे, प्रधान मंत्री बनने के बाद किसी ने ये सवाल नहीं पूछा।

दिल्ली की जनता ने ऐसा जनादेश दिया की दिल्ली में विपक्ष बचा ही नहीं। नाम मात्र के लिए बीजेपी के 3 विधायक दिल्ली विधानसभा में होगे। विपक्ष का न होना लोकतंत्र के लिए अच्छी निशानी नहीं। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरुरी है सवाल पूछना, आलोचना करना, विरोध करना। पिछले कुछ वर्षो में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का ऐसा पतन हुआ की विपक्ष होते हुए भी उसने कभी विपक्ष की भूमिका नहीं निभाई। खबरे आने लगी की सवाल पूछने के विधायको और सांसदो को पैसे दिए जाते है। सदन में किसी भी विषय पर बहस हो चाहे विरोध हर राजनैतिक पार्टी की राय निर्धारित की जाती है पार्टी हाईकमान द्वारा, और उस पार्टी के विधायक, सांसद एक सुर में अपनी बात रखते है. इन जनप्रतिनिधियो को चुनकर भेजने वाली जनता की भूमिका केवल मतदान तक सिमित रहती है, चुन कर आने के बाद वो जनता का नहीं बल्कि अपनी हाई कमान का आदेश मानते है.दिल्ली का जनादेश साफ है – न वो मोदी के खिलाफ है न कांग्रेस के, जनादेश इस व्यवस्था के खिलाफ है और वैकल्पिक राजनीति के पक्ष में. जनता अब सच्चा लोकतंत्र चाहती है जहा उनका जनप्रतिनिधि उनके हितो की बात करे, पूंजीपतियो या अपने हाई कमान के नहीं.

दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को मौका दिया है सच्चा लोकतंत्र स्थापित करने का. पुरानी व्यवस्था के जनप्रतिनिधियो का तक़रीबन सफाया हो गया. अब जनता नए तरह की राजनीति देखना चाहती है जहा सदन में सार्थक बहस हो, उनका चुना हुआ प्रतिनिधि सदन में उनकी बात रखे, जहा सदन में माइक तोड़ने और हाथापाई जैसी घटनाये न हो. विपक्ष के अभाव में केजरीवाल के पास मौका है व्हिप सिस्टम को ख़त्म करने का, हर जनप्रतिनिधि को अपनी बात रखने की पूरी आजादी देने का.
व्हिप सिस्टम एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे पार्टी अपने सांसदो या विधायको को विशिष्ट दिशा में मतदान करने का  निर्देश जारी करती है. राष्ट्रपति चुनाव के दौरान व्हिप सिस्टम के खिलाफ एक याचिका माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त की जा चुकी है. संभव है की इस व्यवस्था का अच्छा पक्ष भी हो और इस पर बहस हो सकती है. व्यवस्था में ऐसा बदलाव हो जिससे व्हिप सिस्टम का दुरुपयोग रोक जा सके, जिसमे जनप्रतिनिधि की जवाबदेही सबसे पहले उसकी जनता के प्रति हो. स्वराज स्थापना की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम होगा।
Delhi Mandate is an opportunity to do away with the whip system. Delhi assembly is left with no oppoisition. Kejriwal should cash on this opportunity and let the MLAs speak for themselves.

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