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वन्दे मातरम! भारत माता की जय

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वन्दे मातरम! भारत माता की जय 

नारों के साथ ही अपने लेख की शुरुवात कर रहा हु. कुछ लोगो शर्त रखी है की देशभक्त हो तो नारा लगाओ. वो लोग भी इस लेख पढ़े इसलिए पहले ही नारा लगा रहा हु. साथ ही यह भी कह दू की यदि किसी ने भारत में रहते हुए “पाकिस्तान जिंदाबाद” का नारा लगाया, भारत के तुकडे तुकडे करने की बात कही तो उसपर देशद्रोह का मुकदमा चले और कानूनन सख्त से सख्त सजा दी जाए. मैं तो यह भी कहूँगा की कानून बदल कर सख्त बनाये जाए – तिरंगे का अपमान करने वालो के लिए सख्त सजा का प्रावधान हो.

लेकिन क्या बस यह नारा मात्र लगाने से मैं देशभक्त हो गया? यह नारा लगाने मात्र में से मैं बराबर हो गया, उस जवान के जो अपनी पत्नी, बूढ़े माता पिता और मासूम बच्चो को छोड़ कर सरहद पर चला जाता है, देशपर जान न्योछावर करने? मैं बराबर हो गया, उस किसान के जिसका परिवार चाहे भूका सोये, पुरे देश के लिए कड़ी मेहनत कर अनाज बोता है? उस मजदुर के जो अधनंगी हालत में कड़ी धुप में मेहनत कर देश निर्माण कर रहा है?

ये शर्त रखने वालो से मैं नहीं पूछूँगा की आपने देश के लिए क्या किया. बेशक उनमे से कोई वकालत कर रहा है, कोई पढाई कर रहा है, कोई नौकरी कर देश निर्माण में हाथ बटा रहा है तो कोई उन नेताओ के साथी है जो हमारे देश की दशा और दिशा तय करते है. मुझे किसी भारतीय की देशभक्ति पर शक नहीं है. हाँ हमारे चुने हुए नेताओ से ये पूछने का अधिकार जरुर है की जिस दिशा में आप हमारे देश को ले जा रहे हो क्या वो देशहित में है? संभव है हो, और हमारे चुने हुए प्रतिनिधि होने के नाते आप हमें समझाये की वो किस तरह देशहित में है.

ये सवाल पूछना देशद्रोह नहीं हो सकता. अपने देश के भविष्य के बारे में सोचना देशद्रोह नहीं हो सकता, अपने नेताओ से सवाल करना देशद्रोह नहीं हो सकता, आँखे बंद कर देश को सत्ताधारी नेताओ के हाथ छोड़ देने के बजाय, हर बहस में भागीदार बनना देशद्रोह नहीं हो सकता. ये न सिर्फ हर देशवासी की अधिकार है बल्कि सबुत है उसकी देशभक्ति का.

पिछले डेढ़ साल से देश में बहसों का दौर चल रहा है जो की स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है बशर्ते बहस भी स्वस्थ हो. लेकिन देश के साहित्यिक 2 खेमो में बंट गए, फिर फ़िल्मकार, वैज्ञानिक और अब पत्रकार. युवा पहले ही बंट चूका था – एक गुट के लिए एक नेता के सभी निर्णय इश्वर के आदेश के समान है तो दुसरे गुट के लिए दुसरे नेता के. सोशल मीडिया पर युवाओ का मुद्दे पर तर्क कुतर्क के बजाय, एक दुसरे को भद्दी भद्दी गालिया देना पिछले 2-3 साल से जारी था लेकिन अब विख्यात फ़िल्मी हस्तिया, पत्रकार भी उस हद तक बंट गए. मानो देश का हर इन्सान अब या तो मोदी भक्त है या मोदी विरोधी.

हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी एक अच्छे नेता है. और नेता का अर्थ प्रतिनिधि होता है. हम सब की जिम्मेदारी है हर मुद्दे पर अपनी अपनी बात रखना और उनका दायित्व है देश के बहुमत का सम्मान करना. लेकिन सोचिये क्या होगा यदि हम सब सोचना ही बंद कर दे? क्या होगा यदि हम सब मोदी भक्त और मोदी विरोधी दो खेमो बंट जाए. फिर न किसी मुद्दे पर सामूहिक राय होगी और न सच्चे अर्थो में लोकतंत्र रहेगा. फिर केवल नूरा कुश्ती चलेगी. जब तक मोदी समर्थक खेमे में जादा लोग है उनकी तानाशाही चलेगी और जब दुसरे खेमे में जादा लोग हो जाए तो किसी और की तानाशाही.

अब वर्तमान मुद्दे पर आते है. मान लेते है की अब हमारे देश में न भुकमरी है, न बेरोजगारी, न भ्रष्टाचार और न गरीबी. मान लेते है की देश में केवल एक ही समस्या है, और वो है देश के अन्दर रहने वाले कुछ गद्दार देशद्रोही. सहमत हु की उन देशद्रोहियों को ढूंड कर गिरफ्तार किया जाए और कानूनन सख्त से सख्त सजा दी जाए. लेकिन क्या उन्हें ढूंडने और दण्डित करने का हमारा तरीका सही है? क्या एक विडियो (जिसकी सत्यता अबतक प्रमाणित नहीं हो पाई है) में भीड़ के बिच आ रहे देशविरोधी नारों के आधार पर हम विडियो में दिखाई दे रहे हमारे ही किसी भी भाई को जान से मार देंगे? सोचिये यदि भीड़ में दिखने वाला वो चेहरा आपका बेटा या छोटा भाई हो. क्या आप उससे ये भी नहीं पूछोगे की तुमने ये नारा लगाया या नहीं? क्या आप उसे उस भीड़ के हवाले कर दोगे जिसकी भावनाए इतनी भड़की हुई है की वो किसी भी इन्सान को जानवर की तरह नोच डाले? क्या अब उसके गुनाहगार या बेगुनाह होने का फैसला न्यायालय में नहीं बल्कि न्यूज़ चैनल के स्टूडियो में होगा? क्या अब न्यायाधीश की जिम्मेदारी न्यायालय के बाहर खड़े वकीलों का झुण्ड या किसी चैनल का संपादक करेगा?

देशद्रोह कदापि बर्दाश्त नहीं. लेकिन इनका गुनाह तो अभी साबित भी नहीं हुआ. हमने क्या कारवाही की उस राजनैतिक दल (पीडीपी) के खिलाफ जो अफजल गुरु की वकालत करते हुए कश्मीर की सत्ता तक पहुँच गया? क्या हुआ अकबर उद्दीन ओवैसी का जिसका देशविरोधी भाषण हम सभी को लोकसभा चुनावो के पहले बार बार दिखाया जा रहा था? क्यों हमें गुस्सा नहीं आता इन नेताओ के खिलाफ जो देश में रहते हुए देश के खिलाफ बोलते है? क्या सिर्फ इसलिए के वो ताकतवर है? जिस मर्दानगी के साथ हम इन छात्रो को पीटने निकल पड़ते है वही हम उनके खिलाफ क्यों नहीं दिखाते जो आये दिन कश्मीर में रहते हुए तिरंगे का अपमान करते है? हमारी सरकार क्यों कश्मीर और पूर्वोत्तर के अलागावादियो के साथ बातचीत करती है जिन्होंने हमारे कई जवानों और मासूम नागरिको को मौत के घाट उतार दिया? क्या सिर्फ इसलिए की हम उनके हथियारों से डरते है और अपनी पूरी मर्दानगी इन निहत्ते छात्रो पर उतरना चाहते है? या कही हम भावनाओ में बहकर नेताओ की कटपुतलिया तो नहीं बन गए? ताकि वो जब चाहे ध्रुवीकरण से हमें बाँट कर अपना राजनैतिक स्वार्थ साध ले. या कही यह सब केवल नेताओ ने इस लिए तो नहीं रचा ताकि हम असहिष्णुता और देशप्रेम की बहस में ही उलझे रहे और भूल जाए उन वादों को जो इन्होने चुनाव से पहले किये थे?

मेरी व्यक्तिगत राय में ये दिशा सही नहीं है. ये हमें लोकतंत्र से तानाशाही की और या शायद भीड़तंत्र/अराजकता की और धकेल देगी. मैं चिंतित हु अपने देश के भविष्य के लिए. मैं चिंतित हु खुद के लिए, अपने परिवार के लिए, अपने मित्रो के लिए, अपने देशवासियों के लिए. मैं नहीं चाहता की उनका न्याय कोई भीड़ करे या किसी चैनल का संपादक. राजनीति में युवाओ का योगदान एक शुभ संकेत है लेकिन मेरी राय में यदि ये युवा देशभक्ति छोड़ नेताओ का भक्त बन जाए तो शायद नहीं. मैं मानता हु की हर मुद्दे पर स्वस्थ बहस हो, देश की नामी गिरामी हस्तिया बहस में हिस्सा ले. लेकिन बेहतर हो यदि वो मुद्दे किसानो की आत्महत्या, भुकमरी, बेरोजगारी से जुड़े हो. बेहतर हो की बहस इस हद्द तक न जाए बड़े से बड़े सम्मान पा चुकी इन हस्तियों का चरित्र्हरण और अपमान हो.

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