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वो 49 दिन – आइये मिलकर इतिहास लिखे

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वर्ष 2012 जाते जाते भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आया। 26 नवम्बर को एक नई पार्टी की स्थापना हुई – आम आदमी पार्टी। इसकी स्थापना के पहले इतिहास रहा – डेढ़ साल तक लगातार सडको पर चले जनांदोलन का, जन भावनाओ का अनादर करते नेताओ के बयानों का। स्थापित राष्ट्रिय पार्टियो के नेता बड़ी उदंडता से कहते – “जन लोकपाल चाहिए तो लड़ो चुनाव और बनाओ अपनी सरकार”।

पार्टी तो बन गई लेकिन सवाल कई थे। पैसा कहा से आएगा? पानी की तरह पैसा लुटाने वाली पार्टियो के खिलाफ हम कहा टिक पाएंगे? हमें राजनीति का अनुभव नहीं और उनकी पीढ़िया बीत गई राजनीति करते। कैसे मुकाबला कर पाएंगे? कहा से लाएंगे भले लोगो को जो राजनीति में अपने हाथ गंदे करने को राजी हो? वोट तो जाती और धर्म के नाम पर पड़ते है, आपको कैसे मिलेंगे? वोटिंग के पहले दिन शराब और पैसा बंटता है, आप कैसे रोक पाओगे?

ये सब हुआ भी। साथ ही ऐन चुनावो के पहले फर्जी सर्वे कराये गए। टीवी पर बड़े बड़े चैनल आम आदमी पार्टी को केवल 2-8 सिट मिलने का दावा कर रहे थे। इसका निश्चित प्रभाव कुछ मतदाताओ पर बड़ा। इन सारी प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद दिल्ली में पहली बार आम आदमी पार्टी की सरकार बनीं। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।
और फिर वो ऐतिहासिक दिन आया – 28 दिसंबर 2013। लाखो लोगो के बिच अरविन्द केजरीवाल ने रामलीला मैदान पर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस शपथ ग्रहण समारोह का वीडियो देख कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते है, गला भर आता है और आँखों से आसु बहने लगते है। उसके बाद के 49 दिन किसी सुनहरे सपने से कम नहीं। अनिल कपूर की “नायक” फ़िल्म मानो हकीकत बन रही हो।

प्रयास जारी है किसी तरह जनता के दिमाग से उन 49 दिनों की यादे मिटाने का, फिर उसके लिए चाहे जो करना पड़े। बड़े अचम्भे की बात है की इसमे वो काफी हद तक सफल भी रहे। कई युवाओ के दिमाग में केजरीवाल के लिए नफरत पैदा कर दी गई है। लेकिन वो बेचारे खुद नहीं जानते की वो नफरत करते क्यों है? क्या वो बेईमान है? भ्रष्ट है? गुंडा है? अपराधी है? जवाब नहीं मिलता। खून, बलात्कार, घोटालो के आरोपी सरकार चलाये और हमें ये बताया जाए की उनसे बड़ा गुनहगार केजरीवाल है जिसने उन्हें चुनौती दी। और प्रभाव इतना की हम उसे मान ले। आज हम बलात्कारियो, अपराधियो, भ्रष्टो को उतना नहीं कोसते जितना इन सब से देश की राजनीति मुक्त करने निकले केजरीवाल को।
खैर इन सारे प्रयासों का असर उन्ही पर है जिन पर मीडिया का प्रभाव पड़ता है। दिल्ली की झुग्गिओ में रहने वाले, ठेलीयो के सहारे अपना पेट पालने वाले, गरीब आम आदमी के लिए केजरीवाल भगवान से कम नहीं। प्रयास चाहे जितना हो वो 49 दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में हमेशा याद रहेंगे।

एक प्रयास उन 49 दिनों की यादो को कागज पर उतारने का। 28 दिसंबर 2014 को एक लेख प्रकाशित करूँगा 28 दिसंबर 2013 के उस ऐतिहासिक दिन के सारे घटनाक्रमो को लेकर। और फिर प्रयास होगा 14 फ़रवरी 2015 तक रोजाना एक लेख लिखने का जिसमे उस दिन से ठीक एक साल पहले वाले दिन के घटनाक्रमो का ब्यौरा होगा। यह एक प्रयास है उन 49 दिनों की यादे ताजा करने का। जानकारी मिलेगी प्रमुख अखबारो और मीडिया की वेबसाइट से। Archives सेक्शन से आसानी से उस दिन खबरे खोजी जा सकती है।

अकेले यह सब कर पाना मुश्किल है लेकिन प्रयास करूँगा। और यदि आप हाथ बटाएं तो हम सब मिलकर उस सुनहरे इतिहास को आसानी से कागज पर उतार सकते है। यदि आप किसी भी एक दिन के विषय में लेख लिखने का भी जिम्मा ले तो कुछ लोग मिलकर इसे आसानी से पूरा कर सकते है। मुझे विश्वास है की भविष्य में इन सभी लेखो को जोड़कर एक किताब प्रकाशित हो सकती है – “वो 49 दिन”। यदि आप एक भी लेख लिखकर इस प्रयास में योगदान करना चाहे तो निचे कमेंट बॉक्स में लिखे।

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